Saturday, June 13, 2026
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अल-फलाह की लैब से केमिकल्स बाहर ले जाने का शक:रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली;

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दिल्ली ब्लास्ट की जांच में अब एक नया और गंभीर एंगल सामने आया है। अल-फलाह यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में ग्लासवेयर एंट्री, कंज्यूमेबल रिकॉर्ड और केमिकल उठान का डेटा आपस में मेल नहीं खा रहा है। जांच एजेंसियों को शक है कि यह सब सामान बार-बार छोटे बैचों में लैब से बाहर ले जाया गया और इसे शैक्षणिक गतिविधियों के नाम पर छिपाया गया।

दैनिक भास्कर के सूत्रों के मुताबिक कुछ ग्लासवेयर की एंट्री तो दर्ज है, लेकिन न खपत दिखी, न टूट-फूट का रिकॉर्ड मिला। यह भी संदेह है कि जिन छोटे कंटेनरों और कांच के बर्तनों को बाहर ले जाया गया, वे वैज्ञानिक तरीके से विस्फोटक तैयार करने के लिए जरूरी उपकरण हैं और सटीक मिश्रण और स्टेबलाइजेशन टेस्टिंग में काम आते हैं।

NIA ने अब इसी संदर्भ में डॉ. मुजम्मिल, डॉ. शाहीन और डॉ. अदील को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ शुरू कर दी है। एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि लैब से निकलने वाले रसायन चुनता कौन था? और ब्लेंडिंग/मिक्सिंग की वैज्ञानिक प्रक्रिया किसने डिजाइन की?

एजेंसियों का मानना है कि ये लोग किसी ‘हाई-इंटेलेक्ट साइंटिफिक नेटवर्क’ का हिस्सा हो सकते हैं, जो व्हाइट-कॉलर टेरर मॉड्यूल की तरह काम कर रहा था।

जम्मू-कश्मीर में अस्पतालों और कॉलेजों के लॉकरों के साथ-साथ उर्वरक और रसायन बेचने वालों पर सख्ती शुरू हो गई है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने सरकारी और निजी अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों और कर्मचारियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे लॉकरों की जांच तेज कर दी है।

एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि इसका मकसद सुनिश्चित करना है कि लॉकरों का गलत इस्तेमाल न हो।

दिल्ली ब्लास्ट की जांच में सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ा खुलासा किया था कि जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी मॉड्यूल कश्मीर के अस्पतालों को हथियारों का ठिकाना बनाने की कोशिश कर रहा था।

यह तरीका हमास की रणनीति से मिलता-जुलता है, जो नागरिक इलाकों और अस्पतालों को हथियारों के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करता है।

ऐसा माना जा रहा है कि इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए शुक्रवार को भी गांदरबल और कुपवाड़ा जिलों के कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लॉकर्स की तलाशी ली गई। यह तलाशी अभियान बुधवार से ही जारी है।

पूर्व डीजीपी ने कहा आतंकी 1990 में अस्पतालों का हथियारों के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करते थे। जिसके बाद आर्मी और पुलिस ने इसे पूरा क्लीन किया था। अब फिर अस्पतालों को ठिकाना बनाया जा रहा था।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि इस मॉड्यूल ने कितने अस्पतालों को ठिकाना बनाने की कोशिश की और हथियारों की सप्लाई चेन कहां तक फैली हुई थी। दिल्ली ब्लास्ट के बाद से ही NIA और स्थानीय पुलिस इस नेटवर्क को तोड़ने में लगी है।

 

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