पंजाब कांग्रेस में नई संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर छिड़ा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने पार्टी हाईकमान की निर्णय प्रक्रिया और डैमेज कंट्रोल की क्षमता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
रंधावा ने कहा कि पार्टी के प्रति वर्षों से वफादार और ईमानदारी से काम करने वाले नेताओं की लगातार अनदेखी की जा रही है। इसका नकारात्मक असर जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है, जबकि विपक्षी दल सोशल मीडिया पर कांग्रेस की स्थिति का मजाक उड़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यदि संगठनात्मक सूची को लेकर पहले ही निर्णय लिया जा चुका था, तो हफ्तों तक बैठकें करने और विवाद पैदा होने देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उनके मुताबिक, हाईकमान को पहले ही दिन स्पष्ट शब्दों में यह कह देना चाहिए था कि यही अंतिम फैसला है और सभी को इसे स्वीकार करना होगा।
रंधावा ने बताया कि इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ कई दौर की चर्चा हुई। बाद में उन्हें और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को भी बुलाया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब चार महीने पहले तैयार सूची पर सभी हस्ताक्षर कर चुके थे और अंततः वही फैसला लागू करना था, तो इतनी लंबी प्रक्रिया अपनाने का क्या औचित्य था।
उन्होंने कहा कि मौजूदा विवाद नेतृत्व की निर्णय लेने की प्रक्रिया की कमजोरी को दर्शाता है। उनके अनुसार, कई दौर की बैठकों के बाद भी असंतोष सामने आना नेतृत्व की सबसे बड़ी विफलता है।
रंधावा ने कहा कि आज पार्टी के भीतर वफादार और समर्पित नेताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय सीमित पदाधिकारी होने के बावजूद संगठन बेहतर ढंग से चलता था, जबकि आज बड़ी टीम होने के बावजूद दिल्ली स्तर पर डैमेज कंट्रोल प्रभावी नहीं दिख रहा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें किसी व्यक्ति विशेष के प्रदेश अध्यक्ष बनने से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “मुझे चरणजीत सिंह चन्नी, राजा वड़िंग या किसी अन्य नेता के अध्यक्ष बनने से कोई दिक्कत नहीं है। मेरी आपत्ति केवल इस बात पर है कि फैसला लेने से पहले पार्टी को अनावश्यक विवाद में उलझने दिया गया।”


