चंडीगढ़: पंजाब कांग्रेस में संगठनात्मक फेरबदल के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस हाईकमान द्वारा गठित नई चुनावी समितियों में चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी को जगह नहीं दी गई, जिसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी सार्वजनिक कर दी।
मनीष तिवारी ने बिना किसी का नाम लिए लिखा कि जब किसी व्यक्ति की योग्यता दूसरों की असुरक्षा बन जाती है, तब फैसले संगठनात्मक नहीं बल्कि व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से प्रेरित होते हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने उन्हें पिछले 45 वर्षों में बहुत कुछ दिया है और उन्होंने भी अपना पूरा राजनीतिक जीवन पार्टी की सेवा में समर्पित किया है। इसके बावजूद उन्हें इस तरह नजरअंदाज किया जाना हैरान करने वाला है।
तिवारी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि उन्होंने 1981 में NSUI के एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया था। छात्र राजनीति से लेकर युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा सांसद तक का सफर उन्होंने कांग्रेस के साथ तय किया। पोस्ट के अंत में उन्होंने लिखा— “Que sera, sera, Whatever will be, will be…”, यानी “जो होगा, सो होगा।”
उनकी इस टिप्पणी के बाद पंजाब से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि यदि नाराजगी दूर नहीं हुई तो इसका असर विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की एकजुटता पर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मनीष तिवारी को चुनाव अभियान समिति और घोषणापत्र समिति जैसी अहम समितियों से बाहर रखना पंजाब कांग्रेस में जारी गुटबाजी का संकेत माना जा रहा है। उनका कहना है कि तिवारी की ट्राईसिटी और आनंदपुर साहिब क्षेत्र में मजबूत राजनीतिक पकड़ है और उन्हें चुनावी रणनीति से दूर रखना पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन की राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
मनीष तिवारी को नई समितियों से बाहर किए जाने के बाद उनके समर्थकों में भी नाराजगी देखी जा रही है। वहीं विपक्षी दल भी कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को लेकर पार्टी पर निशाना साध रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले इस तरह की नाराजगी कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है।


