Thursday, May 14, 2026
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भारत ब्रह्मोस का नया वर्जन तैयार कर रहा:रेंज 450-800 किमी तक; दिल्ली से इस्लामाबाद को निशाना बनाया जा सकेगा

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ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के 6 एयरबेस को तबाह कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई भारत की सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल अब और भी ताकतवर होने जा रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार ब्रह्मोस की रेंज, रफ्तार और मारक क्षमता को और बेहतर किया जा रहा है।

फिलहाल इसकी रेंज करीब 300 किलोमीटर है, लेकिन नए वर्जन में इसे 450 किलोमीटर से लेकर 800 किलोमीटर तक करने पर काम चल रहा है। इन नई मिसाइलों के आने के बाद दिल्ली से ही पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को निशाना बनाया जा सकेगा। दिल्ली और इस्लामाबाद की हवाई दूरी 700 किलोमीटर है।

वहीं, ब्रह्मोस का हल्का वर्जन भी बनाया जा रहा है। ब्रह्मोस का करीब ढाई टन वजनी खास वर्जन सुखोई एमकेआई-30 लड़ाकू विमान के नीचे (अंडरबेली) लगाने के लिए तैयार किया गया है। यह वर्जन अब प्रोजेक्ट डिजाइन बोर्ड से मंजूरी के बाद अगले चरण में पहुंच गया है।

अभी ज्यादा रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइल के ग्राउंड ट्रायल की तैयारी चल रही है। इस नए वर्जन के अगले तीन साल में पूरी तरह विकसित होने की उम्मीद है। अगर सब कुछ तय योजना के मुताबिक रहा तो ब्रह्मोस के इस नए वर्जन का पहला परीक्षण 2027 के अंत तक किया जा सकता है।

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज और घातक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। यह ‘दागो और भूल जाओ’ तकनीक पर काम करती है और मैक-3 (ध्वनि की गति 332 मी./सेकेंड से तिगुनी) की रफ्तार से टारगेट पर हमला करती है। इसकी तेज गति के कारण दुश्मन के रडार इसे समय रहते पकड़ नहीं पाते।

ब्रह्मोस एयरोस्पेस 2016 में मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) का सदस्य बना। इस रिजीम में 35 देश शामिल हैं। इसके बाद ही ब्रह्मोस की रेंज को 300 किमी से आगे बढ़ाने पर काम शुरू हुआ।

दरअसल, MTCR के नियमों के तहत गैर-सदस्य देशों को 300 किमी से ज्यादा रेंज वाली मिसाइल तकनीक नहीं दी जा सकती, इसलिए पहले ब्रह्मोस की रेंज सीमित थी। अब ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस के 3 नए वर्जन पर काम तेज कर दिया गया है।

इनकी रेंज 450, 600 और 800 किमी तक बढ़ाने की योजना है। वायुसेना के लिए ब्रह्मोस का हल्का संस्करण भी तैयार किया जा रहा है। जमीन और समुद्र से दागी जाने वाली ब्रह्मोस का वजन करीब 3 टन होता है, जिसे वायुसेना के लिए घटाकर लगभग ढाई टन किया जा रहा है।

 

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